अधूरी टोली1

Chapter 1: सबसे अधूरी टोली

अधूरी टोली by Kahani Writer

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मणिकोट में सुबह का समय था। सूरज अभी पूरी तरह निकला भी नहीं था, लेकिन शहर के बीचों-बीच बने संघ दरबार के बाहर भीड़ लग चुकी थी। हर तरफ चमकते कवच, लंबे भाले, जादुई छड़ियां, उड़ते हुए बाज़, आग उगलते छोटे ड्रैगन और अपनी-अपनी ताकत दिखाते योद्धा खड़े थे। आज साल का सबसे बड़ा दिन था। राज्य मिशन दिवस। इस दिन राजा की ओर से सभी योद्धा-संघों को मिशन दिए जाते थे। जो संघ जितना ताकतवर होता, उसे उतना बड़ा मिशन मिलता। जो संघ सफल होता, उसका नाम पूरे राज्य में फैल जाता। लेकिन उसी भीड़ के सबसे पीछे, एक टूटी हुई दीवार के पास, पांच लोग ऐसे खड़े थे जिन्हें देखकर कोई भी कह सकता था— “ये लोग मिशन लेने आए हैं या गलती से सब्ज़ी मंडी का रास्ता भूल गए हैं?” सबसे आगे खड़ा था आरव। ना उसके पास चमकता कवच था, ना कोई भारी तलवार। बस पुरानी कमीज़, फटी हुई जैकेट, कमर पर एक साधारण तलवार और चेहरे पर ऐसी मुस्कान जैसे उसे खुद नहीं पता कि वह यहाँ क्यों खड़ा है। उसके पीछे खड़ा था भैरव, टोली का योद्धा। योद्धा कहना थोड़ा ज्यादा तारीफ हो जाती। क्योंकि भैरव का कवच बड़ा था। ढाल भी बड़ी थी। शरीर भी मजबूत था। लेकिन हिम्मत? हिम्मत उसकी इतनी छोटी थी कि शायद जेब में भी आराम से आ जाए। वह बार-बार अपनी विशाल ढाल के पीछे छिप रहा था। “आरव,” भैरव ने कांपती आवाज़ में कहा, “अगर हमें कोई खतरनाक मिशन मिला तो?” आरव ने आराम से जवाब दिया, “तो हम मना कर देंगे।” “और अगर मना नहीं कर पाए तो?” “तो तुम ढाल लेकर आगे खड़े हो जाना।” भैरव की आंखें फैल गईं। “मैं? आगे? क्यों?” आरव मुस्कुराया। “क्योंकि ढाल तुम्हारे पास है।” भैरव ने अपनी ढाल को देखा, फिर आरव को। “मुझे लगा ये सिर्फ डर छुपाने के काम आती है।” पास खड़ा दुबला-पतला लड़का तुरंत बोला, “वैज्ञानिक रूप से देखा जाए तो ढाल का असली उपयोग रक्षा करना है, डर छुपाना नहीं।” यह था तिलक, टोली का जादूगर। उसके हाथ में तीन किताबें थीं, कंधे पर दो थैले लटके थे, पीठ पर स्क्रॉल बंधे थे और चश्मा बार-बार नाक से नीचे फिसल रहा था। तिलक बहुत पढ़ा-लिखा था। समस्या बस इतनी थी कि वह जो पढ़ता था, वही भूल जाता था। आरव ने पूछा, “तिलक, आज कौन-सा जादू तैयार किया है?” तिलक ने गर्व से किताब खोली। “आज मैंने अग्नि-वर्षा मंत्र याद किया है।” भैरव घबरा गया। “अग्नि-वर्षा? मतलब आसमान से आग गिरेगी?” तिलक ने पन्ने पलटे। “शायद। या फिर फूल गिरेंगे। रुको, मैंने पेज गलत खोल लिया है।” आरव ने गहरी सांस ली। “बहुत बढ़िया। दुश्मन को कम से कम confusion तो होगा।” तभी जमीन पर बैठी काले कपड़ों वाली छोटी सी आकृति सुबकने लगी। वह थी छाया, टोली की assassin। नाम सुनकर लोग डर जाते थे। काले कपड़े, चेहरा आधा ढका हुआ, कमर पर दो छोटे खंजर—सब कुछ उसे खतरनाक बनाता था। बस एक दिक्कत थी। वह बहुत भावुक थी। बहुत ज्यादा। कोई उसे “छोटी” बोल दे तो रो देती थी। कोई “बहादुर” बोल दे तो भी रो देती थी। कोई कुछ ना बोले तो भी उसे लगता था सब उसे नजरअंदाज कर रहे हैं, और तब भी रो देती थी। छाया ने धीमी आवाज़ में कहा, “मुझे लगता है आज भी हमें सबके सामने बेइज्जत किया जाएगा।” भैरव बोला, “मुझे भी यही लगता है।” छाया ने भैरव की तरफ देखा। “तुमने मेरा साथ दिया?” “हाँ।” छाया की आंखें भर आईं। “धन्यवाद। तुम अच्छे इंसान हो।” भैरव पीछे हट गया। “अरे रोना मत, लोग देख रहे हैं।” उनके पास खड़ी मीरा ने माथा पकड़ा हुआ था। मीरा टोली की वैद्य थी। लेकिन उसकी सबसे बड़ी बीमारी यह थी कि वह खुद ही बहुत जल्दी चक्कर खा जाती थी। उसके पास रंग-बिरंगी शीशियों से भरी टोकरी थी। लाल औषधि, नीली औषधि, हरी औषधि, बैंगनी औषधि—सब कुछ था। बस कौन-सी औषधि किस काम आती है, यह उसे हमेशा तुरंत याद नहीं रहता था। आरव ने मीरा से पूछा, “तुम ठीक हो?” मीरा ने आंखें आधी बंद करके कहा, “हाँ, बस हल्का चक्कर है।” “किस बात का?” “भीड़ देखकर।” “तो आंखें बंद कर लो।” मीरा ने आंखें बंद कीं। फिर बोली, “अब अंधेरा देखकर चक्कर आ रहा है।” आरव ने आसमान की तरफ देखा। “हे देवताओं, तुमने हमें टोली बनाई है या परीक्षा?” उसी समय संघ दरबार के दरवाजे खुले। अंदर से एक लंबा आदमी बाहर आया। उसके कपड़े चमकदार थे, मूंछें नुकीली थीं और आवाज़ ऐसी थी जैसे हर शब्द में घमंड लगाया गया हो। वह था मिशन अधिकारी दिग्विजय। उसने ऊंची आवाज़ में घोषणा की, “सभी योद्धा-संघ ध्यान दें! इस वर्ष के राज्य मिशन अब वितरित किए जाएंगे।” भीड़ में जोश भर गया। “पहला मिशन—सूर्य संघ के लिए!” सूर्य संघ के योद्धा आगे आए। उनके कवच सोने की तरह चमक रहे थे। उनके नेता ने गर्व से सिर उठाया। दिग्विजय ने पढ़ा, “उत्तरी सीमा पर बर्फीले दानवों का हमला रोकना।” भीड़ ने तालियां बजाईं। “वाह!” “सूर्य संघ ही कर सकता है!” “राज्य की शान!” आरव ने धीरे से कहा, “बर्फीले दानव? अच्छा हुआ हमें नहीं मिला।” भैरव ने तुरंत कहा, “सही कहा। ठंड में मेरी हिम्मत और सिकुड़ जाती है।” दिग्विजय फिर बोला, “दूसरा मिशन—वज्र संघ के लिए। पहाड़ी किले से लापता राजदूत को बचाना।” फिर तालियां। “तीसरा मिशन—नागफणि संघ के लिए। ज़हरीले जंगल से अमृत लाना।” फिर तालियां। एक-एक करके सभी बड़े संघों को बड़े-बड़े मिशन मिलने लगे। और फिर अंत में दिग्विजय ने कागज के सबसे नीचे देखा। उसके चेहरे पर मुस्कान फैल गई। वह मुस्कान अच्छी नहीं थी। “और अब…” भीड़ शांत हो गई। दिग्विजय ने नाटकीय अंदाज में कहा, “राज्य की सबसे प्रसिद्ध… या कहूं, सबसे बदनाम टोली।” लोग हंसने लगे। आरव ने धीरे से कहा, “लगता है हमारा नंबर आ गया।” भैरव ढाल के पीछे छिप गया। तिलक ने गलत किताब उठा ली। छाया पहले से ही रोने लगी। मीरा ने औषधि की शीशी खोलकर सूंघी और बोली, “ये बेहोशी की दवा थी या नींबू पानी?” दिग्विजय ने जोर से घोषणा की— “अधूरी टोली!” भीड़ में जोरदार ठहाका गूंज उठा। “अरे ये भी आए हैं?” “इन्हें मिशन नहीं, आराम चाहिए!” “इनसे तो मेरी बिल्ली ज्यादा बहादुर है!” छाया ने खंजर निकाला, फिर तुरंत वापस रख दिया। “मैं बिल्ली से तुलना नहीं होना चाहती…” आरव ने गहरी सांस ली और आगे बढ़ा। दिग्विजय ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा। “तो तुम हो अधूरी टोली के नए नेता?” आरव बोला, “नेता तो नहीं… बस बाकी चारों ने मुझे आगे धक्का दे दिया था।” पीछे से भैरव बोला, “नेता वही जो सबसे कम डरता हो।” आरव ने पीछे मुड़कर कहा, “मैं कम नहीं डरता। बस अच्छी acting कर लेता हूँ।” भीड़ फिर हंस पड़ी। दिग्विजय ने एक छोटा-सा कागज निकाला। “तुम्हारे लिए खास मिशन है।” आरव ने कागज लिया। उसने पढ़ा— “पूर्वी बाजार से संघ दरबार तक राजा की नीली मुहर वाला लकड़ी का संदूक पहुंचाना।” आरव ने पलकें झपकाईं। “बस?” दिग्विजय ने मुस्कुराते हुए कहा, “हाँ, बस। बहुत कठिन मिशन है। रास्ते में सब्ज़ी मंडी भी पड़ेगी।” भीड़ में फिर हंसी छूट गई। भैरव ने राहत की सांस ली। “संदूक उठाना है? बस इतना? मैं कर सकता हूँ। शायद।” तिलक ने गंभीरता से कहा, “लकड़ी का संदूक भी कई प्रकार का होता है। साधारण, जादुई, शापित, विस्फोटक—” भैरव चिल्लाया, “चुप रहो!” मीरा ने कमजोर आवाज़ में कहा, “मुझे लगता है ये मिशन हमारे level का है।” छाया ने आंसू पोंछे। “कम से कम इस बार कोई दानव नहीं है।” आरव ने कागज मोड़ा। “ठीक है। अधूरी टोली यह महान संदूक मिशन स्वीकार करती है।” दिग्विजय ने ताली बजाई, जैसे मजाक उड़ा रहा हो। “राज्य तुम्हारी महान सेवा याद रखेगा।” भीड़ हंसती रही। लेकिन आरव को फर्क नहीं पड़ा। क्योंकि सच यह था कि अधूरी टोली को किसी बड़े मिशन की जरूरत नहीं थी। उन्हें बस एक मौका चाहिए था—कुछ करने का, कुछ साबित करने का। चाहे वह सिर्फ एक संदूक उठाने का काम ही क्यों ना हो। पूर्वी बाजार मणिकोट का सबसे शोरगुल वाला हिस्सा था। दुकानदार चिल्ला रहे थे। “जादुई आम ले लो! खाने से आवाज़ मीठी हो जाएगी!” “उड़ने वाली चप्पल! एक खरीदो, एक भागेगी!” “दानव भगाने वाला इत्र! सिर्फ तीन सिक्के!” भैरव ने एक दुकान की तरफ देखा। “दानव भगाने वाला इत्र सच में काम करता होगा?” दुकानदार ने तुरंत बोतल उठाई। “बिल्कुल! दानव तो दूर, पड़ोसी भी पास नहीं आते!” आरव बोला, “मत खरीदना। हमें अभी पड़ोसी नहीं, पैसा बचाना है।” मिशन कागज में लिखा था कि संदूक गणपत सामान भंडार से लेना है। गणपत सामान भंडार एक पुरानी दुकान थी, जिसके बाहर इतना सामान रखा था कि दुकान अंदर है या बाहर, समझना मुश्किल था। एक मोटे से आदमी ने उन्हें देखते ही पूछा, “अधूरी टोली?” आरव ने सिर हिलाया। “जी।” गणपत ने राहत की सांस ली। “अच्छा हुआ आ गए। ये रहा संदूक।” उसने एक छोटा लकड़ी का संदूक आगे किया। संदूक सच में साधारण लग रहा था। ना चमक, ना जादू, ना आवाज़। बस ऊपर नीले रंग की मोम लगी थी, जिस पर राजा की मुहर बनी थी। भैरव ने संदूक उठाया। “इतना हल्का? मैं तो समझा था भारी होगा।” तभी संदूक के अंदर से हल्की-सी आवाज़ आई। ठक। सब रुक गए। भैरव ने संदूक नीचे रख दिया। “ये आवाज़ किसकी थी?” गणपत ने तुरंत नज़रें चुराईं। “लकड़ी पुरानी है। आवाज़ करती रहती है।” फिर आवाज़ आई। ठक… ठक… तिलक की आंखें चमक उठीं। “दिलचस्प। संभव है इसमें कोई जीवित वस्तु हो।” भैरव ने पीछे हटते हुए कहा, “जीवित? संदूक में?” मीरा ने कहा, “शायद चूहा होगा।” छाया ने धीमे से पूछा, “चूहा भावुक होता है क्या?” आरव ने गणपत को घूरा। “इसमें क्या है?” गणपत पसीना पोंछते हुए बोला, “राजा की मुहर है। खोलना मना है। तुम्हें सिर्फ पहुंचाना है।” आरव ने संदूक की नीली मुहर देखी। सच में, राजसी मुहर तोड़ना अपराध था। उसने संदूक उठाया और बोला, “ठीक है। हम इसे नहीं खोलेंगे।” फिर संदूक के अंदर से एक बहुत ही हल्की आवाज़ आई। “बचाओ…” पांचों के चेहरे बदल गए। भैरव ने अपनी ढाल उठा ली। तिलक ने किताब उल्टी पकड़ ली। मीरा ने गलती से औषधि पी ली और बोली, “ओह… ये तो नींद वाली थी।” छाया की आंखों में आंसू आ गए। “संदूक भी रो रहा है…” आरव ने धीरे से संदूक जमीन पर रखा। उसने गणपत की तरफ देखा। “आपने कहा था लकड़ी आवाज़ कर रही है।” गणपत पीछे हटने लगा। “मैं… मैं तो व्यापारी हूँ। मुझे कुछ नहीं पता। मुझे तो बस कहा गया था कि ये संदूक संघ दरबार भेजना है।” आरव ने पूछा, “किसने कहा था?” गणपत ने दुकान के अंदर देखा, फिर बाजार की भीड़ की तरफ। “एक आदमी था… काला चोगा पहने हुए। उसने कहा था कि अगर संदूक रास्ते में खुला, तो मणिकोट में आफत आ जाएगी।” तिलक ने तुरंत कहा, “तो फिर हमें नहीं खोलना चाहिए।” भैरव ने राहत की सांस ली। “हाँ, बिल्कुल नहीं खोलना चाहिए।” छाया ने संदूक की तरफ देखा। अंदर से फिर धीमी आवाज़ आई। “कोई है…?” अब मीरा ने भी आंखें खोलीं। “ये आवाज़ तो बच्चे जैसी लग रही है।” आरव चुप हो गया। उसके सामने दो रास्ते थे। पहला—मिशन पूरा करो, संदूक पहुंचाओ, पैसा लो, और सुरक्षित रहो। दूसरा—राजसी मुहर तोड़ो, नियम तोड़ो, और शायद मुसीबत में पड़ो। आरव ने अपनी टोली की तरफ देखा। डरपोक योद्धा। भुलक्कड़ जादूगर। रोती हुई assassin। चक्कर खाने वाली वैद्य। और वह खुद—एक ऐसा लड़का जिसे नेता बनने का कोई शौक नहीं था। आरव ने मन ही मन सोचा— “हम सच में अधूरे हैं।” फिर उसने संदूक की तरफ देखा। “लेकिन इतने भी अधूरे नहीं कि किसी को बंद देखकर निकल जाएं।” भैरव घबरा गया। “आरव, तुम वो चेहरा मत बनाओ।” आरव ने पूछा, “कौन-सा चेहरा?” “वही, जिसमें तुम बेवकूफी भरा बहादुरी वाला फैसला लेते हो।” आरव ने तलवार निकाली। छाया खड़ी हो गई। “मैं तुम्हारे साथ हूँ।” तिलक बोला, “मैं भी। हालांकि कानूनी परिणामों पर मेरी एक लंबी चिंता है।” मीरा ने आधी नींद में कहा, “मैं भी… शायद।” भैरव ने कांपते हुए ढाल उठाई। “ठीक है। अगर सब मुसीबत में जा रहे हैं, तो मैं अकेला सुरक्षित नहीं रह सकता। वो और डरावना होगा।” आरव ने नीली मुहर पर तलवार की नोक रखी। गणपत चिल्लाया, “मत खोलो!” लेकिन देर हो चुकी थी। मुहर टूट गई। संदूक का ढक्कन अपने आप खुला। अंदर नीली रोशनी चमकी। बाजार की सारी आवाज़ें अचानक बंद हो गईं। संदूक के अंदर कोई बच्चा नहीं था। वहाँ एक छोटा-सा नीला अंडा रखा था। उसकी सतह पर सुनहरी रेखाएं चमक रही थीं। अंडा धड़क रहा था, जैसे उसके अंदर कोई जिंदा चीज़ सांस ले रही हो। तिलक का मुंह खुला रह गया। “ये… ये तो…” आरव ने पूछा, “क्या है?” तिलक ने कांपती आवाज़ में कहा— “ये साधारण अंडा नहीं है। ये तो… प्राचीन जीव का अंडा लगता है।” तभी आसमान काला होने लगा। पूर्वी बाजार की गलियों में ठंडी हवा दौड़ गई। एक-एक करके दुकानों के दीये बुझने लगे। भीड़ डरकर पीछे हटने लगी। और फिर बाजार के दूसरी तरफ से एक भारी आवाज़ गूंजी— “मुहर किसने तोड़ी?” भैरव ने धीरे से आरव के कंधे पर हाथ रखा। “कृपया कह दो कि हमने नहीं तोड़ी।” आरव ने तलवार कसकर पकड़ी। छाया ने खंजर निकाल लिया। तिलक ने किताब सही दिशा में पकड़ने की कोशिश की। मीरा ने औषधि की बोतल उठाई, फिर पूछा, “ये उपचार वाली है या विस्फोट वाली?” और गली के अंधेरे से तीन काले चोगे वाले आदमी बाहर आए। उनकी आंखें नीली रोशनी में चमक रही थीं। बीच वाले ने संदूक की तरफ इशारा किया। “अंडा हमें सौंप दो।” आरव ने पूछा, “और अगर ना दें तो?” काले चोगे वाले आदमी की मुस्कान फैल गई। “तो अधूरी टोली की कहानी पहले अध्याय में ही खत्म हो जाएगी।” आरव ने अपनी टोली की तरफ देखा। सब डरे हुए थे। बहुत डरे हुए। लेकिन कोई पीछे नहीं हटा। आरव मुस्कुराया। “गलत बोल दिया भाई।” काला चोगा वाला आदमी ठिठक गया। “क्या?” आरव ने तलवार उठाई। “हमारी कहानी पहले अध्याय में खत्म नहीं होती।” उसने नीले अंडे को उठाया। “यहीं से शुरू होती है।” और उसी क्षण अंडे के अंदर से एक तेज़ दरार की आवाज़ आई। कड़क! नीली रोशनी पूरे बाजार में फैल गई। अधूरी टोली ने एक साथ चीख मारी। क्योंकि अंडा फूटने वाला था।

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Demo Reader

Jun 18, 2026

this is comment in adhoori toli